हरियाणा की 1646 वार्ड कमेटियों पर कानूनी संकट, हाईकोर्ट वकील ने सरकार को भेजा नोटिस

हरियाणा की 1646 वार्ड समितियों पर कानूनी सवाल उठे हैं। वकील ने 2008 कानून, गठन अधिकार और संविधान की 3 लाख आबादी शर्त का हवाला दिया।

हरियाणा की 1646 वार्ड कमेटियों पर कानूनी संकट, हाईकोर्ट वकील ने सरकार को भेजा नोटिस

हरियाणा की 1646 वार्ड कमेटियों पर कानूनी और संवैधानिक सवाल, सरकार को भेजा गया कानूनी नोटिस

➤ वकील हेमंत कुमार ने 2008 के कानून, गठन के अधिकार और 3 लाख आबादी की शर्त को लेकर उठाए सवाल

➤ दावा- 76 नगर परिषदों और नगरपालिकाओं की कमेटियों को संविधान के अनुच्छेद 243(S) के तहत वैध नहीं ठहराया जा सकता

पंचकूला। हरियाणा में आमजन की शिकायतों के त्वरित समाधान के लिए गठित की गई 1646 वार्ड समितियों के अस्तित्व को लेकर कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के वकील और नगर-निकाय कानूनों के जानकार हेमंत कुमार ने प्रदेश की सभी 87 नगर पालिकाओं/निकायों में गठित इन वार्ड कमेटियों को गैर-कानूनी और असंवैधानिक बताते हुए हरियाणा सरकार के शहरी स्थानीय निकाय विभाग के आयुक्त, सचिव और महानिदेशक को कानूनी नोटिस भेजा है।

मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की ओर से शहरी निकायों में आमजन की सुविधा और शिकायतों के समाधान के लिए वार्ड समितियों के गठन की जानकारी हाल ही में दी गई थी। सरकारी स्तर पर बताया गया है कि सितंबर तक 87 में से 86 शहरी स्थानीय निकायों में 1,646 वार्ड कमेटियां गठित की जा चुकी हैं और वे सक्रिय हैं।

अब इन समितियों के गठन को लेकर उठाए गए कानूनी सवालों ने व्यवस्था पर नई बहस छेड़ दी है। एडवोकेट हेमंत कुमार ने अपने कानूनी नोटिस में 2008 के हरियाणा म्युनिसिपल सिटिजन्स पार्टिसिपेशन एक्ट, 1994 के नगर निगम कानून और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243(S) का हवाला देते हुए वार्ड समितियों के गठन की वैधता पर सवाल उठाया है।

2008 के कानून को लेकर उठाया गया पहला सवाल

हेमंत कुमार के अनुसार, हरियाणा सरकार ने वार्ड समितियों के गठन के लिए 2008 के 'हरियाणा म्युनिसिपल सिटिजन्स पार्टिसिपेशन एक्ट' को आधार बनाया है। उनका कहना है कि इस कानून की धारा 2(G) केवल 1973 के एक्ट के तहत आने वाली नगर परिषदों और नगरपालिकाओं पर लागू होती है।

उनके अनुसार, प्रदेश के 11 नगर निगम 1994 के कानून के तहत बने हैं। ऐसे में 2008 का कानून इन नगर निगमों पर लागू नहीं होता। इसी आधार पर उन्होंने नगर निगमों में वार्ड समितियों के गठन की कानूनी वैधता पर सवाल खड़ा किया है।

निगम सदनों के पास कमेटियां बनाने का अधिकार नहीं होने का दावा

कानूनी नोटिस में वार्ड कमेटियों के गठन के अधिकार को लेकर भी सवाल उठाया गया है। एडवोकेट हेमंत कुमार के अनुसार, 1994 के नगर निगम कानून की धारा 10 के तहत नगर निगमों में वार्ड कमेटियां गठित करने का अधिकार केवल राज्य सरकार के पास है।

उनका कहना है कि मेयर, निगम सदन या कमिश्नर को स्वयं वार्ड समितियां गठित करने का अधिकार नहीं है। ऐसे में यदि निगम सदनों की ओर से अपने स्तर पर कमेटियां गठित की गई हैं तो यह उनके अनुसार अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन है।

संविधान के अनुच्छेद 243(S) का भी दिया हवाला

कानूनी विवाद का सबसे अहम आधार भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243(S) बताया गया है। एडवोकेट हेमंत कुमार के अनुसार, इस प्रावधान के तहत वार्ड समितियां केवल उन स्थानों पर बनाई जा सकती हैं, जहां की आबादी 3 लाख या उससे अधिक हो।

उन्होंने हरियाणा के 1973 के कानून का हवाला देते हुए कहा है कि प्रदेश की नगर परिषदों की आबादी 50 हजार से 3 लाख और नगरपालिका समितियों की आबादी 50 हजार तक होती है। ऐसे में उनके अनुसार इन निकायों में वार्ड समितियों का गठन संविधान के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।

इसी आधार पर उन्होंने प्रदेश की सभी 76 नगर परिषदों और नगरपालिकाओं में बनाई गई वार्ड समितियों को असंवैधानिक बताया है। उनका तर्क है कि जब इन निकायों की आबादी 3 लाख की संवैधानिक सीमा तक नहीं पहुंचती, तो वहां वार्ड समितियों का गठन नहीं किया जा सकता।

केवल 11 नगर निगमों की कमेटियों को मिल सकती है राहत

एडवोकेट हेमंत कुमार के अनुसार, यदि राज्य सरकार विधानसभा में संशोधन लाकर 2008 के कानून की धारा 2(G) में 'नगर निगमों' को शामिल कर देती है और 1994 के कानून की धारा 10 में संशोधन करके वार्ड समितियों के गठन का अधिकार निगम सदनों को दे देती है, तो केवल प्रदेश के 11 नगर निगमों की वार्ड कमेटियों को कानूनी वैधता मिल सकती है।

हालांकि, उनका कहना है कि 76 नगर परिषदों और नगरपालिकाओं में बनी वार्ड कमेटियों को राज्य सरकार केवल अपने कानून में संशोधन करके वैध नहीं ठहरा सकती। इसके पीछे उन्होंने संविधान में दी गई 3 लाख की आबादी वाली शर्त को आधार बनाया है।

कमेटियां रद्द नहीं हुईं तो अदालत में चुनौती देने की बात

हेमंत कुमार के अनुसार, 76 नगर परिषदों और नगरपालिकाओं में गठित वार्ड समितियों को मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा है कि यदि सरकार इन कमेटियों को रद्द नहीं करती है तो इस मामले को अदालत में चुनौती दी जा सकती है।

इस पूरे विवाद में अब सरकार की ओर से लिए जाने वाले कदम महत्वपूर्ण होंगे। एक तरफ वार्ड समितियों को आमजन की शिकायतों के समाधान और शहरी क्षेत्रों की स्थानीय समस्याओं पर निगरानी के लिए सक्रिय किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ इनके गठन के कानूनी आधार पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। सरकारी स्तर पर वार्ड समितियों को शहरी स्वच्छता, स्थानीय समस्याओं की पहचान और नागरिकों की भागीदारी में भूमिका देने की बात कही गई है।

इस मामले में अंतिम कानूनी स्थिति संबंधित कानूनों, सरकारी आदेशों और अदालत में होने वाली सुनवाई के आधार पर स्पष्ट होगी। फिलहाल कानूनी नोटिस के जरिए 1646 वार्ड समितियों के गठन की वैधता पर सवाल उठाए जाने से हरियाणा के शहरी स्थानीय निकायों से जुड़ा यह मामला चर्चा में आ गया है।