हरियाणा के कर्मचारियों को न्यूनतम वेतनमान का लाभ, हाईकोर्ट ने सरकार की अपीलें खारिज कीं
हरियाणा के कर्मचारियों को न्यूनतम वेतनमान के मामले में हाईकोर्ट से राहत मिली। अदालत ने सरकार की अपीलें खारिज कर वरुण गुप्ता केस को अंतिम माना।
➤ हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के पक्ष में सुनाया फैसला
➤ ‘वरुण गुप्ता केस’ के फैसले को माना अंतिम
➤ समान स्थिति वाले कर्मचारियों को लाभ देने के आदेश बरकरार
हरियाणा के कर्मचारियों से जुड़े न्यूनतम वेतनमान के मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपीलों को खारिज कर दिया है। 21 सितंबर 2026 को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जिस मामले में कानूनी स्थिति पहले ही तय हो चुकी है और फैसला अंतिम रूप ले चुका है, उसी परिस्थिति वाले अन्य कर्मचारियों को राहत देने वाले आदेश में हस्तक्षेप का आधार नहीं बनता। अदालत ने कहा कि मौजूदा मामलों में कर्मचारियों की स्थिति ‘वरुण गुप्ता बनाम हरियाणा सरकार’ मामले से अलग नहीं है।
मामला वर्ष 2019 में सामने आए वरुण गुप्ता केस से जुड़ा है। 3 जुलाई 2019 को एकल पीठ ने वरुण गुप्ता की याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें न्यूनतम वेतनमान का लाभ देने का निर्देश दिया था। इस फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने अपील की थी, लेकिन बाद की कानूनी प्रक्रिया में भी सरकार को राहत नहीं मिली।
सरकार ने दी थी 3 नवंबर 2017 के निर्देशों की दलील
मौजूदा मामलों की सुनवाई के दौरान हरियाणा सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि 3 नवंबर 2017 को जारी सरकारी निर्देशों की सही व्याख्या नहीं की गई है। सरकार का पक्ष था कि इन निर्देशों के आधार पर संबंधित कर्मचारियों को न्यूनतम वेतनमान का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि वरुण गुप्ता मामले में भी इसी तरह का दावा सामने आया था और उस मामले में याचिका स्वीकार किए जाने के बाद राज्य सरकार की ओर से अपील की गई थी। बाद में उस मामले में भी अदालतों के समक्ष मामला गया, लेकिन सरकार को राहत नहीं मिली।
वरुण गुप्ता केस में पहले क्या हुआ था
वरुण गुप्ता मामले में 3 जुलाई 2019 को एकल पीठ ने न्यूनतम वेतनमान देने का आदेश दिया था। इसके बाद राज्य सरकार ने अपील दायर की। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने भी मामले पर सुनवाई की और बाद में राज्य सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की गई।
रिकॉर्ड के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में दायर एसएलपी वापस ली गई और हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की अनुमति ली गई। इसके बाद 13 दिसंबर 2024 को हाईकोर्ट की समन्वय पीठ ने पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी।
हाईकोर्ट ने 21 सितंबर 2026 के अपने आदेश में कहा कि पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद राज्य की ओर से आगे की किसी कार्यवाही के बारे में अदालत के सामने कुछ नहीं रखा गया। ऐसे में वरुण गुप्ता मामले का फैसला अंतिम रूप ले चुका है।
1 नवंबर 2017 से लाभ का सवाल भी हुआ स्पष्ट
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, वरुण गुप्ता मामले से जुड़े आदेशों में 1 नवंबर 2017 को न्यूनतम वेतनमान के लाभ की प्रभावी तारीख के रूप में देखा गया। 13 दिसंबर 2024 के पुनर्विचार आदेश में भी 3 नवंबर 2017 के सरकारी निर्देशों के संदर्भ में इसी स्थिति को स्पष्ट किया गया था।
हाईकोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि राज्य सरकार स्वयं वरुण गुप्ता को संबंधित निर्देशों के तहत लाभ दे चुकी थी। इसलिए मौजूदा मामलों में कर्मचारियों और वरुण गुप्ता मामले के बीच ऐसा कोई अलग तथ्य सामने नहीं रखा गया, जिसके आधार पर उन्हें अलग माना जा सके।
समान स्थिति वाले कर्मचारियों को राहत देने के आदेश बरकरार
खंडपीठ ने माना कि जब किसी समान परिस्थिति वाले कर्मचारी के मामले में कानूनी स्थिति स्पष्ट हो चुकी है और फैसला अंतिम रूप ले चुका है, तो उसी आधार पर दूसरे कर्मचारियों को राहत देने वाले एकल पीठ के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की संबंधित सभी अपीलें खारिज कर दीं और कर्मचारियों को न्यूनतम वेतनमान का लाभ देने वाले आदेशों को बरकरार रखा।
इस फैसले से उन कर्मचारियों के मामले में महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट हुई है, जिनकी परिस्थितियां वरुण गुप्ता मामले के समान हैं। हालांकि, वास्तविक लाभ संबंधित कर्मचारी की पात्रता और अदालत के आदेश में तय शर्तों के अनुसार ही निर्धारित होगा।
Akhil Mahajan