ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका, SIR से जुड़े फैसलों और वोटर लिस्ट पर उठे सवाल

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल हुई है। SIR, Form 6, ECINet और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों की जांच और SIT गठन की मांग की गई है

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका, SIR से जुड़े फैसलों और वोटर लिस्ट पर उठे सवाल

➤ CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल
➤ SIR से जुड़े कथित एकतरफा फैसलों को रद्द करने की मांग
➤ 13 करोड़ नाम हटने के दावे पर SIT जांच की मांग


मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई है। याचिका में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़े कथित एकतरफा फैसलों, चुनावी प्रक्रिया में किए गए कुछ बदलावों और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के दावों को लेकर कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि ऐसे फैसलों, दिशा-निर्देशों और सॉफ्टवेयर में किए गए बदलावों की वैधता की जांच की जाए और जिन फैसलों को बिना बहुमत की सहमति के लिए जाने का आरोप है, उन्हें निरस्त किया जाए।

यह याचिका अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दाखिल की गई है और इसे अधिवक्ता चांद कुरैशी के माध्यम से दायर किया गया है। मामले में भारत सरकार, भारत निर्वाचन आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, कैबिनेट सचिव, वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग और निर्वाचन आयोग की आईटी महानिदेशक सीमा खन्ना को प्रतिवादी बनाया गया है। याचिका का मामला Shailendra Mani Tripathi v Union of India के नाम से दर्ज है और इसका डायरी नंबर 59734/2026 बताया गया है।

नवंबर 2025 से अगस्त 2026 तक आपत्तियों का दावा

याचिका में दावा किया गया है कि नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी ने चुनाव आयोग से जुड़े कुछ फैसलों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। याचिका के अनुसार, इन आपत्तियों में चुनावी सूची के पुनरीक्षण, Form 6, मतदाता डेटा और तकनीकी व्यवस्था से जुड़े फैसलों का उल्लेख किया गया है।

इस मामले की पृष्ठभूमि में इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया है। रिपोर्ट में Form 6 में किए गए बदलावों को लेकर दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक, नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े फॉर्म में पिछले SIR से संबंधित जानकारी शामिल की गई थी।

हालांकि, निर्वाचन आयोग ने आयोग के भीतर किसी मतभेद की धारणा से इनकार किया है। आयोग की ओर से कहा गया है कि SIR से जुड़े फैसले सभी तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए थे और उठाए गए मुद्दे प्रक्रिया के दौरान दिए गए सुझाव या इनपुट थे।

Form 6 में बदलाव का मुद्दा

याचिका में नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में कथित बदलाव को प्रमुख आधार बनाया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि वैधानिक फॉर्म में बदलाव के लिए जरूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए था। याचिका में आरोप लगाया गया है कि ECINet पोर्टल पर Form 6 में SIR से संबंधित जानकारी जोड़ी गई।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, नए प्रावधान में आवेदकों से यह जानकारी मांगी गई थी कि उनका नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में था या नहीं, उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम उस सूची में था या नहीं, अथवा इनमें से किसी का नाम नहीं था।

याचिका में मांग की गई है कि Form 6 को उसके मूल वैधानिक स्वरूप में बहाल किया जाए और योग्य वयस्कों को मूल कानूनी प्रावधानों के आधार पर मतदाता के रूप में पंजीकरण की सुविधा दी जाए।

ECINet और मतदाता डेटा पर भी सवाल

याचिका में ECINet के माध्यम से मतदाता डेटा के केंद्रीकरण का मुद्दा भी उठाया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन की जिम्मेदारी कानून के तहत संबंधित Electoral Registration Officer (ERO) की होती है।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग के आईटी सिस्टम के माध्यम से डेटा और सॉफ्टवेयर पर नियंत्रण बढ़ने से स्थानीय अधिकारियों की भूमिका प्रभावित हुई। इन दावों को याचिका में उठाए गए आरोपों के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि किसी न्यायिक निष्कर्ष के रूप में।

गोवा के 97 मतदाताओं का भी उल्लेख

याचिका में गोवा के 97 योग्य मतदाताओं का भी जिक्र किया गया है। याचिकाकर्ता का दावा है कि सॉफ्टवेयर में रोलबैक की सुविधा नहीं होने के कारण अदालत के आदेश के बावजूद इन मतदाताओं के नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं किए जा सके।

इस मामले को भी याचिका में चुनावी डेटा और तकनीकी व्यवस्था से जुड़े सवालों के संदर्भ में रखा गया है।

पश्चिम बंगाल की 16.10 लाख अपीलों का मुद्दा

याचिका में पश्चिम बंगाल की 16.10 लाख अपीलों का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि SIR के दौरान न्यायिक अधिकारियों ने कई नागरिकों के नाम मतदाता सूची में शामिल किए थे, लेकिन उनके नाम शामिल किए जाने को चुनौती देने के लिए चुनाव आयोग के नाम पर अपीलें दाखिल की गईं।

याचिका में इन 16.10 लाख अपीलों को रद्द करने की मांग भी की गई है। साथ ही इस पूरे मामले में जिम्मेदारी तय करने की मांग रखी गई है।

13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटने के दावे पर SIT की मांग

याचिका में देशभर में SIR प्रक्रिया के दौरान करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटने का दावा करते हुए इसकी जांच के लिए न्यायिक जांच आयोग या विशेष जांच दल यानी SIT गठित करने की मांग की गई है। प्रस्तावित जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता और निष्पक्ष आईटी विशेषज्ञों को शामिल करने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ता ने ECINet और ERONet के डेटा का फॉरेंसिक ऑडिट कराने की मांग भी की है, ताकि मतदाता सूची और संबंधित तकनीकी रिकॉर्ड में हुए बदलावों की जांच की जा सके।

अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग

याचिका में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 के तहत उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है, जो जांच में वैधानिक कर्तव्य के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार पाए जाएं। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग, आईटी महानिदेशक सीमा खन्ना और अन्य संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग शामिल है।

याचिका में यह भी मांग की गई है कि चुनाव आयोग से संबंधित ECINet और ERONet के सर्वर लॉग, डेटाबेस, संचार रिकॉर्ड और मेटाडेटा को सुरक्षित रखा जाए, ताकि यदि जांच होती है तो संबंधित डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध रहें।

फिलहाल यह मामला याचिका में लगाए गए आरोपों और मांगी गई राहत से संबंधित है। इन आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष सामने आना बाकी है। निर्वाचन आयोग की ओर से SIR से जुड़े फैसलों को सर्वसम्मति से लिए जाने की बात कही गई है।