शेफाली बोलीं ‘पापा ये बल्ला नहीं चलेगा’, फिर जो हुआ वो इतिहास बन गया.....

हरियाणा की शेफाली वर्मा का क्रिकेट सफर प्रेरणादायक है। पिता की मेहनत, संघर्ष और बेटी के जुनून ने उसे गली क्रिकेट से टीम इंडिया तक पहुंचाया।

शेफाली बोलीं ‘पापा ये बल्ला नहीं चलेगा’, फिर जो हुआ वो इतिहास बन गया.....
  • रोहतक की बेटी शेफाली वर्मा का गली क्रिकेट से टीम इंडिया तक का सफर
  • पिता संजीव वर्मा का संघर्ष और बेटी के जुनून ने रचा इतिहास
  • ‘पापा इस बल्ले से छक्का नहीं लगेगा’—इस एक वाक्य ने बदल दी जिंदगी

हरियाणा के रोहतक की बेटी शेफाली वर्मा का क्रिकेट सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। घनीपुरा की गलियों में प्लास्टिक के बल्ले से खेलना शुरू करने वाली यह लड़की आज भारतीय महिला क्रिकेट टीम की पहचान बन चुकी है।

Shafali Verma shines with help of her father teachings and struggle

उनके पिता संजीव वर्मा, जो पेशे से ज्वेलर्स हैं, बताते हैं कि परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी, लेकिन शेफाली का क्रिकेट के प्रति जुनून अडिग था। जब बाकी बच्चे खिलौनों से खेलते थे, तब शेफाली गेंद-बल्ले से अपना भविष्य गढ़ रही थी।

Shafali Verma shines with help of her father teachings and struggle

संजीव वर्मा याद करते हैं कि एक दिन अभ्यास के दौरान शेफाली का बल्ला टूट गया। उसने मासूमियत से कहा, "पापा, इस बल्ले से गेंद बाउंड्री पार नहीं जाएगी।" पिता के दिल को यह बात छू गई। उन्होंने बिना एक पल गंवाए स्कूटर उठाया और रोहतक से मेरठ तक चले गए। वहां से छह ब्रांडेड बल्ले खरीदकर लौटे। उन्होंने कहा — “उसकी आंखों में क्रिकेट था, मैं कैसे रोक लेता उसे।” यह वाकया पिता-पुत्री के रिश्ते और एक सपने को साकार करने वाले समर्पण की मिसाल है।

Shafali Verma shines with help of her father teachings and struggle

शेफाली ने 15 साल की उम्र में भारतीय महिला टी-20 टीम में जगह बनाई थी। जून 2021 तक वह भारत की सबसे कम उम्र की महिला क्रिकेटर बन गईं। उनके पिता हमेशा कहते हैं कि शेफाली में बचपन से ही वह चमक थी जो किसी साधारण बच्चे में नहीं होती। वह रोज घंटों अभ्यास करती, अपने शॉट्स सुधारती और हर गेंद को सीखने का अवसर मानती थी।

2013 में जब सचिन तेंदुलकर लाहली स्टेडियम में रणजी ट्रॉफी खेलने आए, तो शेफाली उन्हें देखने गई। वही पल उसके जीवन का टर्निंग पॉइंट बना। उसने तय कर लिया कि उसे क्रिकेटर बनना ही है। लड़कों के साथ खेलने से उसकी बल्लेबाजी और मजबूत हुई। उसने क्रिकेट के लिए अपने बाल कटवा लिए, ताकि ध्यान सिर्फ खेल पर रहे। बाद में उसके स्कूल में लड़कियों की टीम बनी, और शेफाली ने वहाँ अग्रणी भूमिका निभाई।

Shafali Verma shines with help of her father teachings and struggle

आज शेफाली न सिर्फ भारत की उभरती सितारा बल्लेबाज़ हैं, बल्कि एक ऐसी मिसाल भी हैं जिसने दिखाया कि सीमित संसाधन भी सपनों की उड़ान को रोक नहीं सकते। वह आज भी हर बड़े फैसले में अपने पिता से सलाह लेती हैं और मानती हैं कि जो कुछ सीखा, वही पिता की बदौलत है।