सोनीपत में निजी अस्‍पताल की अंधेरगर्दी! 74 हजार दो तो तभी मिलेगी डैडबाडी, नौ घंटे तक शव को बंधक बनाया

सोनीपत के निजी हॉस्पिटल ने मृतक जयसिंह का शव 9 घंटे तक बंधक रखा। परिवार से 74 हजार रुपए की मांग की गई और भुगतान आयुष्‍मान कार्ड से किया गया तब जाकर डैडबाडी को परिजनों को सौंपा गया

सोनीपत में निजी अस्‍पताल की अंधेरगर्दी! 74 हजार दो तो तभी मिलेगी डैडबाडी, नौ घंटे तक शव को बंधक बनाया

➤ परिवार से 74हजार रुपए की शर्त, आयुष्‍मान कार्ड के बाद शव दिया गया
➤ व्यवस्था चौपट, अंधेरगर्दी और पुलिस भी बेबस, गंभीर संवेदनहीनता उजागर

सुशील मोर


सोनीपत में एक निजी अस्पताल की अंधेरगर्दी और संवेदनहीनता ने पूरे प्रदेश को हिला दिया। यहां मौत के बाद मृतक जयसिंह का शव अस्पताल में लगभग 9 घंटे तक बंधक रखा गया, जबकि परिवार राेेत हुए तड़प-तड़पकर अपने बेटे का अंतिम संस्कार कराने की गुहार लगा रहा था। अस्पताल प्रशासन ने परिवार से 60 हजार रुपए का बकाया जमा करने की शर्त रखी और शव केवल अरायुषमान कार्ड के जरिए भुगतान के बाद सौंपा। इस घटना ने न केवल अस्पताल की व्यवस्था और अंधेरगर्दी उजागर की, बल्कि पुलिस और प्रशासन की बेबसी को भी बेनकाब कर दिया। 

मृतक जयसिंह, बिहार के दरभंगा के रहने वाले थे और रोजी-रोटी के लिए हाल ही में सोनीपत के बहालगढ़ आए थे। 25 सितंबर 2025 को वह नेशनल हाइवे 44 पर बहालगढ़ के पास जा रहे थे, तभी उन्हें हरियाणा रोडवेज बस ने टक्कर मार दी। गंभीर हालत में उन्हें तुरंत पार्क निदान हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। लेकिन हॉस्पिटल का रवैया आश्चर्यजनक और शर्मनाक था। इलाज के दौरान जयसिंह की मौत हो गई, फिर भी हॉस्पिटल ने शव देने में सैकड़ों घण्टे तक विलंब किया। परिवार के सामने यह शर्त रखी गई कि इलाज के बकाया 60 हजार रुपए जमा होने के बाद ही पार्थिव शरीर सौंपा जाएगा।

परिवार की तकलीफ और मानसिक पीड़ा: मौके पर मौजूद परिजनों ने बताया कि परिवार सुबह से हॉस्पिटल में मौजूद था। वे लगातार अपने बेटे के शव को देखने और अंतिम संस्कार के लिए लेने की गुहार लगा रहे थे, लेकिन प्रशासन ने बेहद कठोर और संवेदनहीन रवैया अपनाया। अस्पताल के कर्मचारी और अधिकारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टालते रहे, जिससे परिवार की तकलीफ और बढ़ गई।

आयुषमान कार्ड के बाद भुगतान और तात्कालिक राहत:आखिरकार, शव आयुषमान कार्ड के माध्यम से भुगतान करने के बाद दिया गया। यह स्पष्ट करता है कि हॉस्पिटल ने मानवता की जगह वित्तीय लाभ को प्राथमिकता दी। मृतक के परिवार ने बताया कि अगर कार्ड के माध्यम से भुगतान नहीं किया जाता, तो उन्हें अपने बेटे का शव लेने के लिए संघर्ष करना पड़ता।

पुलिस की बेबसी और लापरवाही: मूरथल और बहालगढ़ की पुलिस भी मौके पर मौजूद थी, लेकिन वे भी परिवार की मदद करने में असमर्थ रहे। अस्पताल प्रशासन और पुलिस दोनों की संवेदनहीनता और लापरवाही ने इस घटना को और गंभीर बना दिया। इस घटना ने यह दिखा दिया कि निजी हॉस्पिटल में निगरानी और पारदर्शिता की कमी कितनी गंभीर है। मृतक के शव को बंधक बनाना, भुगतान की शर्त रखना और पुलिस की बेबसी — यह केवल एक व्यवस्थागत विफलता नहीं, बल्कि नैतिक और कानूनी अपराध है।


बहालगढ़ थाना ने मृतक की मौत के संबंध में हरियाणा रोडवेज बस चालक के खिलाफ मामला दर्ज किया है। लेकिन इस मामले में हॉस्पिटल प्रशासन की जवाबदेही पर भी कड़ा सवाल खड़ा होता है।