लैंड पूलिंग में जमीन मालिकों का हक,हाई कोर्ट का फैसला, पहली फ्लोटेशन पर मिलेगा प्लॉट
हरियाणा की 2012 लैंड पूलिंग योजना में हाई कोर्ट ने जमीन मालिकों के अधिकार बरकरार रखे। पात्र मालिकों को विकसित प्लॉट या योजना के अनुसार राशि मिलेगी।
हाई कोर्ट ने 2012 की लैंड पूलिंग योजना में जमीन मालिकों के अधिकार बरकरार रखे
➤ झज्जर सेक्टर-6 पार्ट के पात्र भू-स्वामियों को पहली बार सेक्टर फ्लोट होने पर मिलेगा विकसित प्लॉट या योजना के अनुसार राशि
➤ राज्य के आश्वासन पर मुआवजा व अन्य लाभ छोड़ने वाले जमीन मालिकों को योजना से बाहर नहीं किया जा सकता
चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा की वर्ष 2012 की लैंड पूलिंग योजना से जुड़े मामले में जमीन मालिकों के अधिकारों को बरकरार रखा है। अदालत ने झज्जर के सेक्टर-6 पार्ट के लिए अनिवार्य रूप से अधिग्रहित जमीन के पात्र मालिकों को योजना का लाभ देने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेक्टर के पहली बार विकसित होने पर पात्र भू-स्वामियों को उनकी पात्रता के अनुसार विकसित प्लॉट आवंटित किए जाएं या योजना के प्रावधानों के अनुसार राशि का भुगतान किया जाए।
यह आदेश आठ याचिकाओं के निपटारे के दौरान दिया गया। अदालत ने मामले में जमीन मालिकों की ओर से राज्य के आश्वासन पर उठाए गए कदमों और उपलब्ध रिकॉर्ड को ध्यान में रखा। कोर्ट के अनुसार, जिन लोगों ने राज्य के स्पष्ट आश्वासन पर अपनी स्थिति बदली और दूसरे उपलब्ध वैधानिक लाभ नहीं लिए, उन्हें बाद में लैंड पूलिंग योजना के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
राज्य के आश्वासन पर जमीन मालिकों ने छोड़े थे दूसरे वैधानिक लाभ
मामले की सुनवाई जस्टिस विकास बहल और जस्टिस दिव्या शर्मा की खंडपीठ ने की। अदालत ने कहा कि लैंड पूलिंग योजना का उद्देश्य अधिग्रहण के कारण अपनी जमीन गंवाने वाले भू-स्वामियों को विकास प्रक्रिया में भागीदार बनाना था।
कोर्ट के सामने पेश रिकॉर्ड के अनुसार, अधिकारियों की ओर से पात्र जमीन मालिकों को विकसित जमीन देने का आश्वासन दिया गया था। इसी भरोसे पर कुछ याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत मिलने वाले मुआवजे और अन्य वैधानिक लाभ नहीं लिए।
कुछ याचिकाकर्ताओं को 23 अगस्त 2013 के अवार्ड के बाद योजना के तहत 42 लाख रुपये प्रत्येक की अग्रिम राशि भी दी गई थी। ऐसे में जमीन मालिकों की ओर से राज्य के आश्वासन पर अपनी स्थिति बदलने के तथ्य को अदालत ने महत्वपूर्ण माना।
सरकार अपने स्पष्ट आश्वासन से बाद में पीछे नहीं हट सकती
हाई कोर्ट ने कहा कि जब जमीन मालिकों ने राज्य के स्पष्ट आश्वासन पर अपनी स्थिति बदली और दूसरे उपलब्ध लाभ नहीं लिए, तो बाद में उन्हें योजना के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
अधिकारियों की ओर से कुछ मामलों में यह दलील दी गई थी कि याचिकाकर्ताओं ने निर्धारित समय सीमा के भीतर आवेदन नहीं किया था। हालांकि, अदालत ने मूल रिकॉर्ड देखने के बाद इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
पांच याचिकाओं के मामले में रिकॉर्ड से सामने आया कि आवेदन निर्धारित 60 दिन की अवधि के भीतर जमा किए गए थे। अधिकारियों ने इन आवेदनों को सत्यापित करने के बाद स्वीकार भी किया था। ऐसे में केवल आवेदन में देरी का आधार बनाकर योजना का लाभ रोकना उचित नहीं माना गया।
मुआवजा, 33 साल की वार्षिकी और पुनर्वास के लाभ भी नहीं लिए
अन्य याचिकाओं के मामले में भी हाई कोर्ट ने पाया कि जमीन मालिकों ने राज्य के आश्वासन पर अपनी स्थिति बदली थी। उन्होंने न तो अनिवार्य अधिग्रहण का मुआवजा लिया और न ही 33 वर्ष की वार्षिकी अथवा पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन योजना के लाभ प्राप्त किए।
अदालत के अनुसार, ऐसी परिस्थितियों में राज्य जमीन मालिकों को भूमि पूलिंग योजना से बाहर नहीं कर सकता। जब योजना के तहत विकसित जमीन देने का आश्वासन दिया गया था और उस भरोसे पर जमीन मालिकों ने दूसरे उपलब्ध लाभ नहीं लिए, तो उनके योजना के तहत अधिकार को बाद में खत्म नहीं किया जा सकता।
पहली बार सेक्टर फ्लोट होने पर पात्रता के अनुसार मिलेगा विकसित प्लॉट
हाई कोर्ट ने याचिकाएं स्वीकार करते हुए संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को 10 सितंबर 2012 की भूमि पूलिंग योजना के अनुसार विकसित सेक्टर में पहली बार फ्लोटेशन के समय उनकी पात्रता के अनुरूप प्लॉट आवंटित किए जाएं।
यदि योजना के प्रावधानों के अनुसार किसी पात्र जमीन मालिक को प्लॉट के बजाय राशि देय होती है, तो उसे योजना के प्रावधानों के अनुसार राशि का भुगतान किया जाए।
इससे पात्र भू-स्वामियों के लिए यह स्थिति स्पष्ट हो गई है कि सेक्टर के पहली बार फ्लोट होने पर उनकी पात्रता के अनुसार विकसित प्लॉट आवंटन या योजना के तहत देय राशि का भुगतान किया जाना है।
42 लाख रुपये की अग्रिम राशि लौटाने का भी रास्ता बताया
जिन याचिकाकर्ताओं को पहले 42 लाख रुपये की अग्रिम राशि मिली थी और जिसे वापस करना है, उनके लिए भी अदालत ने प्रक्रिया स्पष्ट की है। ऐसे याचिकाकर्ता 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ राशि लौटाने के लिए आवेदन कर सकते हैं।
अदालत ने सक्षम अधिकारी को निर्देश दिया है कि ऐसा आवेदन मिलने के चार सप्ताह के भीतर उस पर निर्णय लिया जाए।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अग्रिम राशि लौटाने के बाद पहली बार सेक्टर फ्लोट होने पर पात्र विकसित प्लॉट पाने के अधिकार पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। यानी अग्रिम राशि लौटाने की प्रक्रिया जमीन मालिकों के योजना के तहत विकसित प्लॉट पाने के अधिकार को प्रभावित नहीं करेगी।
13 साल से अधिक समय बीत चुका, सेक्टर फ्लोटेशन की प्रक्रिया जल्द पूरी करने के निर्देश
खंडपीठ ने इस मामले में यह भी ध्यान में रखा कि अवार्ड की घोषणा को 13 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है। ऐसे में अदालत ने अधिकारियों को संबंधित सेक्टर की फ्लोटेशन प्रक्रिया जल्द पूरी करने का प्रयास करने के निर्देश दिए हैं।
अदालत के आदेश के मुताबिक, अग्रिम राशि लौटाने की प्रक्रिया का जमीन मालिकों के पहली बार सेक्टर फ्लोट होने पर विकसित प्लॉट पाने के अधिकार पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा।
इस फैसले के साथ संबंधित याचिकाकर्ताओं के लिए लैंड पूलिंग योजना के तहत उनके अधिकारों की स्थिति स्पष्ट हो गई है। अब पात्रता के अनुसार विकसित प्लॉट के आवंटन अथवा योजना के प्रावधानों के तहत राशि के भुगतान की प्रक्रिया संबंधित अधिकारियों की ओर से पूरी की जानी है।
Akhil Mahajan