हरियाणा हाईकोर्ट का सख्त रुख: प्रेमी जोड़ों को सुरक्षा देने में देरी जीवन के अधिकार का उल्लंघन
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि प्रेमी जोड़ों को सुरक्षा देने में देरी जीवन के अधिकार का उल्लंघन है। कोर्ट ने अधिकारियों को चेताया कि वे तुरंत सुरक्षा प्रदान करें।
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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा – प्रेमी जोड़ों को सुरक्षा देने में देरी जीवन के अधिकार का उल्लंघन
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कोर्ट ने चेताया – अधिकारी तुरंत सुरक्षा दें, नहीं तो होंगे व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार
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न्यायमूर्ति प्रमोद गोयल बोले – नौकरशाही की लालफीताशाही में फंसाना असंवैधानिक
चंडीगढ़, 8 नवंबर। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में कहा है कि प्रेमी जोड़ों को सुरक्षा देने में देरी उनके जीवन के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा का आवेदन मिलते ही, खासकर विवाह संबंधी मामलों में, तुरंत सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए।
न्यायमूर्ति प्रमोद गोयल की पीठ ने कहा कि राज्य प्राधिकरण की जिम्मेदारी है कि पहले सुरक्षा दी जाए और बाद में जांच की जाए कि खतरा वास्तविक है या नहीं। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि किसी नागरिक द्वारा सुरक्षा का अनुरोध मिलने पर तुरंत कार्रवाई नहीं की जाती, विशेष रूप से विवाह से जुड़े मामलों में, तो संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
यह टिप्पणी उस मामले में आई है, जिसमें एक नवविवाहित जोड़े ने दुल्हन के पिता और भाई से सुरक्षा की मांग की थी। उन्होंने 19 अक्टूबर को प्रतिवेदन दिया था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। जब मामला कोर्ट में पहुंचा, तो राज्य के वकील ने तर्क दिया कि आवेदन हाल ही में मिला है और उचित समय पर कार्रवाई की जाएगी, जिसे कोर्ट ने “पूरी तरह से अनिर्णायक जवाब” बताया।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे जवाबों से एसएचओ को मनमानी करने का अधिकार मिल जाता है, जो कानूनन गलत है। जस्टिस गोयल ने कहा कि सुरक्षा का आवेदन नौकरशाही प्रक्रिया में नहीं उलझाया जा सकता। उन्होंने स्पष्ट कहा, “नोडल अधिकारी का कर्तव्य है कि आवेदन मिलते ही तुरंत सुरक्षा प्रदान करे और बाद में उचित जांच करे।”
कोर्ट ने आगे कहा कि जीवन को खतरे से जुड़े मामलों में निर्णय तुरंत लिया जाना चाहिए, देरी नहीं की जा सकती। सुरक्षा से इनकार करना नागरिक के जीवन के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अधिकारियों से संपर्क करने के बावजूद असुरक्षित रहता है, तो सुरक्षा का उद्देश्य ही खत्म हो जाता है।
ऑनर किलिंग के बढ़ते मामलों का जिक्र करते हुए, कोर्ट ने कहा कि ऐसे कई युवा जोड़े समाज और परिवार की इच्छा के खिलाफ विवाह करने पर हिंसा का शिकार बनते हैं। न्यायालय ने बार-बार ऐसे सम्मान आधारित अपराधों को गंभीर खतरा बताया है।
कोर्ट ने कहा कि अधिकारी बिना ठोस कारण बताए सुरक्षा देने में देरी नहीं कर सकते। ऐसा करना कानून और संविधान दोनों का उल्लंघन है। पीठ ने कहा कि अधिकारियों को अपने कर्तव्यों की जिम्मेदारी लेनी होगी।
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