■ चार चुनावी राज्यों में महिलाओं को 24,500 करोड़ का कैश ट्रांसफर
■ तमिलनाडु, असम, केरल और बंगाल में ‘डायरेक्ट बेनिफिट’ पर बड़ा दांव
■ विशेषज्ञ बोले- सिर्फ नकद योजनाओं से चुनाव जीतना तय नहीं
देश में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले चार राज्यों ने महिलाओं को सीधे बैंक खातों में नकद राशि ट्रांसफर करने का बड़ा दांव खेला है। तमिलनाडु, असम, केरल और पश्चिम बंगाल की सरकारें मिलकर करीब 24,500 करोड़ रुपए महिलाओं को दे रही हैं। इन योजनाओं का मकसद साफ है—महिला वोटर्स को साधना और चुनावी फायदा हासिल करना। इन चारों राज्यों में करीब 4.1 करोड़ महिलाएं इन योजनाओं की लाभार्थी हैं, जो कुल वोटर्स का लगभग 23% हिस्सा बनाती हैं।
तमिलनाडु में सत्ताधारी DMK सरकार ने ‘स्पेशल समर पैकेज’ के तहत महिलाओं के खातों में 2-2 हजार रुपए ट्रांसफर किए हैं। वहीं असम में भाजपा सरकार ने बिहू त्योहार के मौके पर महिलाओं को 4-4 हजार रुपए का बोनस दिया। केरल की वामपंथी सरकार ‘स्त्री सुखम’ योजना के तहत करीब 10 लाख महिलाओं को हर महीने 1000 रुपए दे रही है। पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार ने ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना में हाल ही में 500 रुपए की बढ़ोतरी की है, जिससे राज्य पर हर साल करीब 5 हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
विशेष बात यह है कि नकद सहायता देने का यह ट्रेंड अब तेजी से बढ़ रहा है। पिछले पांच वर्षों में ऐसे राज्यों की संख्या 1 से बढ़कर 15 हो गई है, जो करीब 13 करोड़ महिलाओं को हर साल 2.46 लाख करोड़ रुपए तक का कैश ट्रांसफर कर रहे हैं। यह राशि इन राज्यों के कुल बजट का लगभग 0.7% है। झारखंड जैसे राज्य तो अपने ग्रामीण विकास बजट का 81% हिस्सा इन योजनाओं पर खर्च कर रहे हैं।
हालांकि, इस ट्रेंड के नकारात्मक पहलू भी सामने आ रहे हैं। कई राज्यों में विकास परियोजनाओं के बजट में कटौती कर इन योजनाओं को चलाया जा रहा है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों को भी अपने अन्य खर्चों में कटौती करनी पड़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ नकद योजनाओं के सहारे चुनाव जीतना संभव नहीं है।
सीएसडीएस के डायरेक्टर प्रो. संजय कुमार के अनुसार, अलग-अलग विचारधाराओं की पार्टियां चुनाव जीतने के लिए एक ही फॉर्मूला अपना रही हैं, लेकिन इससे हमेशा सफलता नहीं मिलती। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि आंध्र प्रदेश में कैश ट्रांसफर योजनाओं के बावजूद वाईएसआर कांग्रेस चुनाव हार गई, वहीं राजस्थान में भी ‘इंदिरा महिला सम्मान योजना’ कांग्रेस सरकार को बचा नहीं पाई।
पिछले चुनावों में कई राज्यों में ऐसी योजनाएं गेमचेंजर साबित हुई हैं। मध्य प्रदेश की ‘लाड़ली बहना’, कर्नाटक की ‘गृह लक्ष्मी’, ओडिशा की ‘सुभद्रा’, महाराष्ट्र की ‘लाड़की बहिन’ और झारखंड की ‘मैया सम्मान’ योजनाओं ने महिला वोटर्स को प्रभावित किया और चुनावी परिणामों पर असर डाला।
इसके अलावा चुनावी राज्यों में मुफ्त योजनाओं की भी भरमार है। तमिलनाडु में मुफ्त फ्रिज, गैस सिलेंडर और एजुकेशन लोन वेवर जैसी योजनाएं चलाई जा रही हैं। केरल में पेंशन बढ़ाकर 2000 रुपए कर दी गई है, जबकि पश्चिम बंगाल में बेरोजगार युवाओं के लिए पेंशन पर हर साल 1500 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या ये नकद योजनाएं विकास के मुकाबले ज्यादा प्रभावी साबित होंगी या नहीं।