हाईकोर्ट बोला-सलवार उतारना रेप की कोशिश नहीं, SC नाराज:CJI बोले- बयान आपत्तिजनक; फैसला खारिज हो सकता है

पटना हाईकोर्ट के रेप प्रयास मामले के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया। CJI सूर्यकांत ने कुछ टिप्पणियों को आपत्तिजनक बताया और आदेश पर सवाल उठाए।

हाईकोर्ट बोला-सलवार उतारना रेप की कोशिश नहीं, SC नाराज:CJI बोले- बयान आपत्तिजनक; फैसला खारिज हो सकता है

पटना हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया
CJI सूर्यकांत ने कुछ टिप्पणियों को आपत्तिजनक बताया
आरोपी का पक्ष सुनने के बाद फैसला खारिज होने की संभावना जताई गई


पटना हाईकोर्ट के उस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है, जिसमें एक महिला की सलवार उतारने की कोशिश और उसके सीने को दबाने की घटना को बलात्कार का प्रयास नहीं माना गया था। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने हाईकोर्ट के फैसले में की गई कुछ टिप्पणियों को आपत्तिजनक बताया और कहा कि आरोपी का पक्ष सुनने के बाद इस फैसले को खारिज भी किया जा सकता है।

CJI सूर्यकांत ने बिहार के एडवोकेट जनरल एसडी संजय से कहा कि स्थानीय पुलिस के जरिए आरोपी को नोटिस भेजा जाए। सुप्रीम कोर्ट की यह कार्रवाई ऐसे समय में हुई है, जब अदालत पहले ही यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान न्यायिक भाषा और संवेदनशीलता को लेकर दिशा-निर्देश जारी कर चुकी है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से जुड़ा है मामला

सुप्रीम कोर्ट को जुलाई में पटना हाईकोर्ट के इस आदेश की जानकारी उस समय मिली, जब अदालत इलाहाबाद हाईकोर्ट के इसी तरह के एक आदेश पर सुनवाई कर रही थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में कहा था कि नाबालिग की छाती दबाना और पायजामे का नाड़ा तोड़ना रेप की कोशिश नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में इस आदेश को खारिज कर दिया था।

14 जुलाई को वरिष्ठ वकील शोभा गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट के सामने पटना हाईकोर्ट के आदेश का जिक्र किया था। उन्होंने बताया था कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐसा आदेश रद्द कर चुका है। इसके बावजूद पटना हाईकोर्ट ने इसी तरह की टिप्पणियों के साथ आदेश पारित किया।

सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों की सुनवाई को लेकर जारी की गाइडलाइन

इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला खारिज करने के बाद CJI सूर्यकांत ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी (NJA) की एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट को भी मंजूरी दी थी। इस रिपोर्ट में यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान संवेदनशीलता बनाए रखने के लिए दिशा-निर्देश तैयार किए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने देश की सभी अदालतों को इन गाइडलाइंस का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया था। इसका उद्देश्य यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई को अधिक संवेदनशील, पीड़ित-केंद्रित और गरिमापूर्ण बनाए रखना है।

9 जुलाई को पटना हाईकोर्ट ने सुनाया था फैसला

पटना हाईकोर्ट ने 9 जुलाई 2026 को अपने फैसले में कहा था कि महिला की सलवार उतारने की कोशिश और उसके सीने को दबाने की घटना को बलात्कार का प्रयास नहीं माना जा सकता। अदालत ने विशेष रूप से कहा था कि जब शारीरिक संबंध बनाने का कोई सबूत न हो और बलात्कार के इरादे का कोई कृत्य सामने न आए, तब इसे रेप की कोशिश नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने माना था कि महिला की गरिमा भंग करने का अपराध बनता है, लेकिन रेप की कोशिश का अपराध साबित नहीं होता। इसी आधार पर आरोपी को बरी कर दिया गया था। रेप की कोशिश का यह मामला वर्ष 2008 में बिहार के बांका में दर्ज हुआ था।

2008 में बांका में दर्ज हुई थी FIR

करीब 18 साल पहले 20 जनवरी 2008 को बिहार के बांका में एक स्टूडियो मालिक के खिलाफ रेप की कोशिश की FIR दर्ज हुई थी। युवती ने आरोप लगाया था कि वह अपने पिता के साथ फोटो खिंचवाने के लिए स्टूडियो गई थी।

आरोप के मुताबिक स्टूडियो मालिक हिमांशु ने स्टूडियो का दरवाजा बंद कर दिया। इसके बाद उसने युवती की सलवार उतारने की कोशिश की और रेप के इरादे से उसकी छाती दबाने लगा।

मामले की सुनवाई के बाद 2013 में बांका कोर्ट ने हिमांशु को रेप के प्रयास का दोषी करार दिया था और उसे 3 साल कारावास की सजा सुनाई थी। निचली अदालत के इस फैसले को हिमांशु ने पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

पटना हाईकोर्ट में 13 साल तक चला मामला

हिमांशु के वकील ने पटना हाईकोर्ट में दलील दी थी कि निचली अदालत का फैसला गैरकानूनी है। बचाव पक्ष ने FIR दर्ज होने में देरी का मुद्दा भी उठाया और कहा कि पीड़ित पक्ष ने देरी का उचित कारण नहीं बताया।

करीब 13 साल बाद 9 जुलाई 2026 को पटना हाईकोर्ट के जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि मामले में मेडिकल एविडेंस नहीं है और रेप करने की कोशिश में स्पष्ट शारीरिक प्रयास के प्रमाण भी नहीं हैं। इन्हीं आधारों पर आरोपी को बरी कर दिया गया।

हाईकोर्ट के फैसले के तीन प्रमुख आधार

1. पेनिट्रेशन का कोई सबूत नहीं

कोर्ट ने कहा था कि आरोपी ने बल का प्रयोग किया, दरवाजा बंद किया, सलवार उतारने की कोशिश की और महिला की छाती दबाकर शारीरिक उत्पीड़न किया। हालांकि, अदालत के अनुसार यह घटना रेप के प्रयास की बजाय महिला की मर्यादा को ठेस पहुंचाने वाली थी। कोर्ट ने पेनिट्रेशन का सबूत नहीं पाया और रेप के प्रयास की मेडिकल पुष्टि भी नहीं हुई।

2. चिकित्सा अधिकारी की गवाही नहीं हुई

अदालत ने मामले में कई खामियों का उल्लेख किया। पांच गवाहों में एक स्वतंत्र गवाह था, जो बाद में मुकर गया। जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल करने वाले जांच अधिकारी से मुकदमे के दौरान पूछताछ तक नहीं की गई। इसके अलावा चिकित्सा अधिकारी की गवाही भी नहीं कराई गई।

3. माता-पिता ही मुख्य गवाह थे

इस मामले में पीड़िता के माता-पिता मुख्य गवाह थे। अदालत ने कहा कि उनका मामले के नतीजे से सीधा संबंध है और अदालतें मानती आई हैं कि ऐसे गवाह अपने पक्ष में तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर सकते हैं।

FIR दर्ज करने में हुई देरी को लेकर पीड़िता ने बताया था कि पुलिस स्टेशन में थाना प्रभारी ने शुरुआत में केस दर्ज करने से मना कर दिया था। इसी वजह से अगले दिन FIR दर्ज हुई थी।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया था हवाला

पटना हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा था कि यौन अपराधों के मामलों में पीड़िता की गवाही सजा के लिए पर्याप्त हो सकती है, लेकिन इसके लिए गवाही का बेदाग और पूरी तरह विश्वसनीय होना जरूरी है।

अदालत के अनुसार अगर गवाही में विरोधाभास हों तो बिना स्वतंत्र पुष्टि के आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। हाईकोर्ट ने कहा था कि इस मामले में युवती के बयानों में कई तरह के विरोधाभास हैं।

गाइडलाइन क्यों जरूरी मानी गई

इलाहाबाद हाईकोर्ट के मार्च 2025 के आदेश में नाड़ा तोड़ने और निजी अंग पकड़ने की घटना को रेप की कोशिश के बजाय अपराध की तैयारी माना गया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2026 में कहा था कि ऐसी घटना रेप की कोशिश के दायरे में आती है।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल अकादमी को यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए गाइडलाइंस तैयार करने का निर्देश दिया था। अदालत ने कहा था कि इसका मकसद न्यायाधीशों में संवेदनशीलता और करुणा विकसित करना होना चाहिए, ताकि ऐसे मामलों की सुनवाई पीड़ित-केंद्रित और गरिमापूर्ण तरीके से हो।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि गाइडलाइंस में भारत के सामाजिक ताने-बाने को ध्यान में रखा जाना चाहिए और उन्हें विदेशों की न्यायिक व्यवस्था के आधार पर तैयार नहीं किया जाना चाहिए।

आपत्तिजनक शब्दों और अभिव्यक्तियों को लेकर भी दिशा-निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने एक्सपर्ट कमेटी से कहा था कि समाज में कई ऐसे अपमानजनक शब्द प्रचलित हैं, जिनका इस्तेमाल स्थानीय बोलियों में खुलेआम किया जाता है। इनमें से कुछ शब्द अपराध की श्रेणी में आ सकते हैं, लेकिन लोग कई बार उनकी गंभीरता समझे बिना उनका इस्तेमाल करते हैं।

अदालत ने कहा था कि अगर एक्सपर्ट कमेटी देश की अलग-अलग भाषाओं और बोलियों में प्रचलित ऐसे अपमानजनक शब्दों और अभिव्यक्तियों की पहचान कर सके तो उनके इस्तेमाल को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। इससे यौन अपराधों के शिकायतकर्ता और पीड़ित अपने साथ हुई प्रताड़ना तथा मानसिक आघात का अधिक सटीक और पूरा विवरण अदालत के सामने रख सकेंगे। साथ ही पुलिस, वकील और अदालतें भी उनकी गंभीरता को बेहतर ढंग से समझ सकेंगी।

देश की अदालतों में लागू होगी गाइडलाइन

सुप्रीम कोर्ट ने गाइडलाइन और कॉपी बुक को सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और जिला अदालतों की वेबसाइट पर अपलोड करने का आदेश दिया था। इसे नेशनल ज्यूडिशियल अकादमी, सभी राज्य न्यायिक अकादमियों, राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के विधि विभागों को भी भेजने के निर्देश दिए गए थे।

‘रेप की तैयारी’ और ‘रेप की कोशिश’ में क्या अंतर

25 अक्टूबर 2021 को एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने रेप की तैयारी और रेप की कोशिश के बीच अंतर समझाया था।

रेप की तैयारी में अपराध की योजना बनाना, साधन जुटाना या अपराध करने का इरादा करना शामिल है। यह अपराध शुरू होने से पहले का चरण है। कानून इस प्रयास के लिए सजा देता है, भले ही अपराध पूरा हुआ हो या नहीं। प्रयास करने वाले को सजा दी जाती है क्योंकि इसमें गलत इरादा मौजूद होता है और इससे समाज को नुकसान पहुंचता है।

वहीं रेप की कोशिश तब मानी जाती है जब तैयारी पूरी होने के बाद अपराध को पूरा करने की दिशा में सीधा कदम उठाया जाता है। कोशिश शुरू हो जाती है, लेकिन अपराध पूरा होने से पहले रुक जाता है। कोशिश नाकाम रहने पर भी कानून सजा का प्रावधान करता है, क्योंकि अपराध करने का इरादा और प्रयास मौजूद रहता है।

फैसले को लेकर अलग-अलग राय

पटना हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट सर्वदेव सिंह ने कहा कि हाईकोर्ट ने कानून के तहत ही फैसला सुनाया है और इसका निगेटिव इम्पैक्ट पड़ना गलत है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि लोगों के बीच इस फैसले को लेकर आक्रोश हो सकता है।

वहीं मगध महिला कॉलेज की एसोसिएट प्रोफेसर और साइकोलॉजिस्ट निधि सिंह ने कहा कि ऐसे फैसलों से महिलाओं और बच्चियों में न्याय प्रणाली के प्रति अविश्वास बढ़ सकता है। उनका कहना है कि अगर इतनी गंभीर घटना को हल्की धाराओं में बदल दिया जाएगा तो पीड़ित शिकायत करने और लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने से हिचक सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इससे अपराधियों का मनोबल बढ़ सकता है।

अब सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के फैसले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए आरोपी को नोटिस भेजने की प्रक्रिया शुरू की है। CJI सूर्यकांत की टिप्पणी के बाद मामले में आगे की सुनवाई पर नजर रहेगी और आरोपी का पक्ष सुनने के बाद हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट क्या रुख अपनाता है, यह अगली कार्यवाही में स्पष्ट होगा।