हरियाणा में उकड़ू बैठने की अनोखी प्रतियोगिता:10 घंटे एक जगह बैठे रहे बुजुर्ग बने चैंपियन, कई युवाओं को पछाड़ा
कैथल में आयोजित उकड़ू बैठने की प्रतियोगिता में 82 वर्षीय बुजुर्ग लक्ष्मण सिंह ने 10 घंटे बैठकर युवाओं को मात दी। प्रतियोगिता में 48 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया और 6 विजेता घोषित किए गए।
■ कैथल में उकड़ू बैठने की अनोखी प्रतियोगिता आयोजित
■ 82 वर्षीय बुजुर्ग ने 10 घंटे बैठकर युवाओं को पछाड़ा
■ महिलाओं ने भी लिया हिस्सा, 6 विजेता घोषित
हरियाणा के कैथल जिले के खेड़ी लांबा गांव में एक बेहद अनोखी और दिलचस्प प्रतियोगिता देखने को मिली, जहां उकड़ू बैठने की पारंपरिक शैली को प्रतियोगिता का रूप दिया गया। इस प्रतियोगिता में युवाओं से लेकर बुजुर्गों और महिलाओं तक ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा 82 वर्षीय बुजुर्ग लक्ष्मण सिंह की हो रही है, जिन्होंने करीब 10 घंटे 13 मिनट तक लगातार उकड़ू बैठकर युवाओं को पछाड़ दिया।
प्रतियोगिता सोमवार शाम करीब 4 बजे शुरू हुई, जिसमें कुल 48 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। शुरुआत में माहौल उत्साह से भरा था, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, प्रतिभागी एक-एक कर बाहर होते गए। शुरुआती दो घंटे में ही 10-15 लोग हार मान गए, जबकि कुछ प्रतिभागी बीच-बीच में हिलने या जगह छोड़ने के कारण डिस्क्वालिफाई कर दिए गए।
सबसे दिलचस्प बात यह रही कि प्रतियोगिता के 10 घंटे बीत जाने के बाद भी 6 प्रतिभागी लगातार उकड़ू बैठे रहे। इनमें बुजुर्ग लक्ष्मण सिंह के साथ बलकार, सुभाष, कोका, सुरेंद्र और जगदीश शामिल रहे। आयोजकों ने स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए प्रतियोगिता को यहीं समाप्त कर दिया और सभी छह प्रतिभागियों को संयुक्त रूप से विजेता घोषित किया।
प्रतियोगिता के दौरान कुछ प्रतिभागी हुक्का पीते हुए भी उकड़ू बैठे नजर आए, जिससे माहौल पूरी तरह ग्रामीण और पारंपरिक बना रहा। वहीं कई महिलाओं ने भी इस प्रतियोगिता में भाग लेकर उत्साह दिखाया, जो इस आयोजन की खास बात रही।
आयोजकों ने सभी विजेताओं को 8700-8700 रुपए का इनाम दिया। बुजुर्ग लक्ष्मण सिंह के जज्बे को देखते हुए गांव के लोगों ने उनका विशेष सम्मान भी किया। उन्होंने बताया कि पहले के समय में उकड़ू बैठना आम जीवन का हिस्सा था, लेकिन अब नई पीढ़ी इस परंपरा से दूर होती जा रही है।
गांव के सरपंच सोनू लांबा के अनुसार, इस प्रतियोगिता का उद्देश्य भारतीय पारंपरिक जीवनशैली और योग पद्धति को बढ़ावा देना था, ताकि लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हो सकें।
यह अनोखी प्रतियोगिता न केवल मनोरंजन का साधन बनी, बल्कि इसने यह भी साबित कर दिया कि अनुभव और अभ्यास के सामने उम्र कोई मायने नहीं रखती।
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