661 करोड़ बैंक फ्रॉड केस में IAS आरके सिंह और प्रिंस शर्मा जेल भेजे गए

661 करोड़ रुपये के बैंक फ्रॉड मामले में IAS आरके सिंह और प्रिंस शर्मा को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया। CBI ने कोर्ट में चैट डिलीट करने का दावा किया।

661 करोड़ बैंक फ्रॉड केस में IAS आरके सिंह और प्रिंस शर्मा जेल भेजे गए

➤ IAS आरके सिंह और पूर्व अधीक्षक प्रिंस शर्मा को 14 दिन की न्यायिक हिरासत

➤ CBI का दावा, मास्टरमाइंड से हुई चैट गिरफ्तारी से पहले डिलीट की गई

➤ 661 करोड़ बैंक फ्रॉड मामले में जांच अभी भी कई स्तरों पर जारी


661 करोड़ रुपये के बैंक फ्रॉड मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने पूर्व नगर निगम आयुक्त एवं IAS अधिकारी राम कुमार सिंह और विकास एवं पंचायत विभाग के पूर्व अधीक्षक प्रिंस शर्मा को पंचकूला कोर्ट में पेश किया। सुनवाई के बाद कोर्ट ने दोनों आरोपियों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

कोर्ट में पेशी के दौरान CBI ने बड़ा खुलासा करते हुए दावा किया कि IAS अधिकारी राम कुमार सिंह ने गिरफ्तारी से पहले ही कथित बैंक फ्रॉड के मास्टरमाइंड के साथ हुई अपनी चैटिंग डिलीट कर दी थी। एजेंसी का कहना है कि यह चैट जांच के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकती थी।

CBI ने अदालत को बताया कि मामले की जांच अभी निर्णायक चरण में है और कई महत्वपूर्ण पहलुओं की जांच जारी है। एजेंसी ने कहा कि हरियाणा सरकार और केंद्र सरकार की मंजूरी मिलने के बाद पंचकूला एंटी करप्शन ब्यूरो में दर्ज एफआईआर को अपने हाथ में लिया गया था। इसके बाद भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया।

जांच एजेंसी के अनुसार 21 मई 2026 को 13 आरोपियों के खिलाफ अंतिम रिपोर्ट दाखिल की गई थी। इसके बाद 12 जून को दाखिल पूरक रिपोर्ट में विक्रम वाधवा और राजन सिंह को भी आरोपी बनाया गया। हालांकि अन्य विभागों, अधिकारियों और संदिग्ध व्यक्तियों की भूमिका को लेकर जांच अभी खुली हुई है।

CBI का दावा है कि जांच के दौरान राम कुमार सिंह की भूमिका उस समय सामने आई जब वह नगर निगम पंचकूला और नगर परिषद कालका में आयुक्त के पद पर तैनात थे। वहीं प्रिंस शर्मा की भूमिका विकास एवं पंचायत विभाग में कार्यरत रहने के दौरान सामने आई।

एजेंसी के मुताबिक दोनों आरोपियों को 18 जून को गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद कोर्ट से पुलिस रिमांड लेकर पूछताछ की गई। पूछताछ के दौरान दोनों को डिजिटल और दस्तावेजी साक्ष्यों से सामना कराया गया।

CBI ने आरोपियों से आईडीएफसी बैंक सेक्टर-32 शाखा में खोले गए खाते, फिक्स्ड डिपॉजिट के लिए मांगे गए कोटेशन, मोबाइल नंबर पर प्राप्त बैंक संदेशों, बैंक खातों के स्टेटमेंट, कथित फर्जी लेन-देन और धनराशि के प्रवाह से जुड़े सवाल पूछे। इसके अलावा यह भी जानने की कोशिश की गई कि कथित रूप से अर्जित धन कहां रखा गया और किन माध्यमों से उसका उपयोग किया गया।

जांच एजेंसी ने आरोपियों से यह भी पूछा कि यदि वे मामले में शामिल नहीं थे तो उन्होंने अपने मोबाइल फोन से बातचीत और संदेश क्यों हटाए। एजेंसी का मानना है कि डिलीट किए गए संवाद मामले की सच्चाई तक पहुंचने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

CBI ने सह-आरोपियों को चेक सौंपने, धन के कथित गबन, शेल कंपनियों में रकम ट्रांसफर करने और बाद में सरकारी खातों में धन लौटाने के पीछे की वजहों को लेकर भी पूछताछ की है। जांच एजेंसी अब इस पूरे नेटवर्क में शामिल अन्य बैंक अधिकारियों, सरकारी कर्मचारियों और निजी व्यक्तियों की भूमिका की भी पड़ताल कर रही है।